उसे यह फ़िक्र है हरदम – उनका पोस्टर

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भगत सिंह ने गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण उनमें थोड़ा रोष उत्पन्न हुआ, पर पूरे राष्ट्र की तरह वो भी महात्मा गांधी का सम्मान करते थे. पर उन्होंने गांधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की जगह देश की स्वतन्त्रता के लिये हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने।
शहीद भगत सिंह :  यह आलेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था जो लाहौर से प्रकाशित समाचारपत्र  “द पीपल” में 27 सितम्बर 1931 के अंक में प्रकाशित हुआ था। भगतसिंह ने अपने इस आलेख में ईश्वर के बारे में अनेक तर्क किए हैं। इसमें सामाजिक परिस्थितियों का भी विश्लेषण किया गया है।

उसे यह फ़िक्र है हरदम - उनका पोस्टर
                                              उसे यह फ़िक्र है हरदम – उनका पोस्टर – (शहीद भगत सिंह)

उसे यह फ़िक्र है हरदम(Hindi Poem)

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,

(शहीद भगत सिंह)

उनका पोस्टर

मेरे शहीदों!
आज तक मैनें
किसी से नहीं कहा कि-
तुम्हारी शहादत के बाद भी
तुम्हारे नाम पर
मैंने कितना कुछ सहा।

(शहीद भगत सिंह)

यूं तो मेरा सिर
हमेशा नीचा है
तुम्हारे सामने
लेकिन इस सदी का
सब से बडा अपराधी
( वह भी तुम्हारा )
बना दिया है मुझे
राम ने।

(शहीद भगत सिंह)

मैं खुद को
तुम्हारा निर्लज्ज अपराधी
घोषित करता हूं।
मांगता हूं तुमसे
कठोर सजा
कि-
तूम जब गाड कर
आकाश पर मेरी ध्वजा
वापस नहीं लौटे
तब-
उन्होने मेरी दीवार पर
अपना पोस्टर
बडे दर्प से चिपकाया
और मुझे चेताया-
“देखो –
यह पोस्टर हम
लेई या गोंद से नहीं
शहीदों के खून से
चिपका रहे हैं।

(शहीद भगत सिंह)हिंदी काव्य | Hindi Poetry | Hindi Poet

ससम्मान करना रखवाली
इस पोस्टर की
हम दूसरी दीवार की
तलाश में जा रहें है।”
अब दीवार मेरी
पोस्टर उनका
और खून तुम्हारा।
मातम मेरे घर
और उनके घर
बेशर्म खुशियों का फव्वारा।
मैं चीखना चाहता था
पर चीख नहीं पाया
इस कायर भीड से
अलग दिख नहीं पाया।
मेरे शहीदों!
मेरी दीवार पर
उनके पोस्टर के पीछे लगा
तुम्हारा खून पपडा रहा है
और यह पपडाता लहू
मुझे न जाने कौन-कौन से पाठ
पढा रहा है?

Pinki Kanaujiya.


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