शिव और शक्ति के समभाव से बना प्रकृति का संतुलन

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संतुलन साधने से ही जीवन और मौछ दोनों की प्राप्ति होती है, तभी तो पुरूष और प्रकृति के बिच सामंजस्य से सृष्टि का संचालन सुचारू रूप से संभव होता है। शिव और शाक्ति के प्रतिक-चिन्ह शिवलिंग का यही मंतव्य है।

शिव और शक्ति क्या है

  • समभाव और संतुलन : शिव पुरुष के प्रतिक हैं, तो पार्वती प्रकृति की। पुरुष और प्रकृति के बिच यदि संतुलन न हो, तो सृष्टि का कोई भी कार्य भली-भांति संपन्न नहीं हो सकता है।
  • शिवलिंग के माध्यम से शिवजी अपने भक्तों को यही संदेस देते हैं। देव घर के बाबा वैधनाथ धाम मंदिर के अलावा, दक्षिण भारत में भी शिव तथा शक्ति का विवाह कराया जाता है। विवाह से पहले दोनों को अपने मन के मालिक के रूप में दिखाया जाता है। जहाँ शिव अपना भिक्षु रूप, तो शक्ति अपना भैरवी रूप त्यागकर सामान्य घरेलु रूप धारण कर करते हैं।
  • इस प्रकार भैरवी, ललिता और शिव, शंकर बन जाते हैं। इस वैवाहिक संबंध में न कोई विजेता और न कोई विजित है। दोनों का एक दूसरे पर सम्पूर्ण अधिकार है, जिसे प्रेम कहते है।
  • शिव का सन्देश है कि  प्रत्येक स्त्री-पुरूष का आपने स्वतंत्र ब्रह्मांड है अर्थात आत्मपरक सत्ता होती है। संसार कि और देखने और व्यवहार करने का अपना – अपना अलग ढंग होता है, इसलिए उनके मनोभवों को समझना बेहद जरूरी है।
  • महामृत्युजंय मंत्र जाप से मिलती है, मृत्यु के भय से मुक्ति

शिव शक्ति रहस्य

मान्यता है कि शिव – पार्वती के विवाह के बाद शिव एक अनुयायी भृंगी ने उनकी प्रदक्षिणा करने की इच्छा व्यक्त की। शिव ने कहा कि, आपको शक्ति की भी प्रदक्षिणा करनी होगी, क्योंकि उनके बिना मैं अधूरा हूं।

भृंगी इसके लिए तैयार नहीं हुए। देव और देवी के बिच प्रवेश करने का प्रयत्न किया। इस पर देवी शिव की जंघा पर बैठ गई, जिससे वे ये काम न कर सकें। भृंगी भौरे का रूप धारण कर उन दोनों की गर्दन के बिच से गुजर कर शिव की परिक्रमा पूरी करने का प्रयत्न करने लगे।

तब शिव ने अपना शरीर शक्ति के साथ जोड़ लिया और अर्धनारीश्वर बन गए। ऐसे देवता, जिनका आधा शरीर स्त्री का है।

(समभाव और संतुलन) अर्धनारीश्वर

अब भृंगी दोनों के बीच नहीं आ सकते थे। शक्ति को अपने शरीर का आधा भाग बनकर शिव सन्देश देते है कि वास्तव में स्त्री कि शक्ति को स्वीकार किये बिना पुरुष पूर्ण नहीं हो सकता। शिव की भी प्राप्ति नहीं हो सकती है। देवी के माध्यम से ही शिव की प्राप्ति की जा सकती है प्रकृति के सहयोग के बिना न कल्पना का महत्व है और न इससे उदय होने वाले ज्ञान का। संसार को चलने के लिए ज्ञान का महत्व है। शिव पुरूष और प्रकृति के बीच का अंतर समाप्त कर देते है।

शिव और शक्ति के बीच संभव से ही एक सत्ता का निर्माण हो पाता है। समभाव की सबसे बड़ी शर्त है कि आपस में भय का वातावरण न रहे। मनुष्य एक – दूसरे को मनुष्य ही समझे। यह तभी समभाव है, जब हम भय से परे होंगे।

शिव शक्ति संगम

हम अपने चारों और के वातावरण को हिरण की तरह देखते हैं, जैसे डरे हुए हों या फिर शेर की तरह देखते हैं जैसे दूसरों को डरा रहे हों। दूसरों को देखना दर्शन कहा जाता हैं। पर भय के कारण उत्पन्न दृष्टि जो दूसरों को स्वीकार नहीं करती, दर्शन नहीं कही जा सकती हैं दर्शन तो वह दृष्टि हैं, जो भय से मुक्त हैं। जो दूसरे को शुद्ध दृष्टि से देखती हों।

‘यह मेरा है या यह मेरा नहीं है’ दृष्टि से नहीं। दर्शन समभाव से देखने की दृष्टि है।  ब्रह्मा भय दिखाकर प्रकृति को अपने नियंत्रण में करना चाहते है। वहीँ दूसरी और शिव जी जीवन देते हैं। बदले में कुछ भी अपेक्षा नहीं करते। वे नहीं चाहते कि उनकी आज्ञा मानी जाए। इसीलिए तो शिव महादेव कहलाते है हैं। पार्वती साधना के माध्यम से शिव के हृदय में करुणा और समभाव जगाना चाहती है हैं। इस भाव के बिना सभी प्राणी प्रकृति से बंधे हुए हैं हैं। वे उन्हें बंधन मुक्त करना चाहती हैं हैं।

शिव शक्ति साधना

पार्वती की साधना अन्य तपस्वियों की तपस्या से भिन्न हैं। सुर – असुर और ऋषि ईश्वर की प्राप्ति और अपनी इच्छापूर्ति के लिए तपस्या करते हैं पार्वती किसी भी इच्छा या वरदान को परे रखकर ध्यान लगाती हैं। एक ऐसी तपस्या, जिससे दूसरे का लाभ हो। वे अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि संसार के लाभ के लिए तपस्या करती हैं। शिव पुराण के अनुसार- जब पार्वती शिव को पाने के लिए साधना करती हैं। तो शिव उन्हें शिव उन्हें ध्यान से देखते हैं।

‘शिव इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सती ही पार्वती हैं। वे सोचती हैं कि यदि वे अपनी आंखें बंद कर लेंगे, तो वह काली में बदल जाएंगी और उनका रूप भयंकर हो जाएगा। अगर वे आंखें खोले रहेंगे, तो वह सुन्दर और सुरूप गौरी बनी रहेंगी।इसके आधार पर वे यह बताना चाहते हैं कि अगर प्रकृति को ज्ञान कि दृष्टि से न देखा जाए, तो वह डरावनी हो जाती हैं।यदि ज्ञान के साथ देखा जाए तो वह सजग और सुंदर प्रतीत होती हैं। पार्वती शिव को अपना दर्पण दिखती हैं, जिसमें वे अपना शंकर (शांत) रूप देख पाते हैं।



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