Home / घरेलु नुस्खे / आयुर्वेदिक पौधे / सुनहरे पलाश और तूलिका का जीवन Palash and life golden paintbrush

सुनहरे पलाश और तूलिका का जीवन Palash and life golden paintbrush

सुनहरे पलाश और तूलिका का जीवन Palash and life golden paintbrush

तूलिका को पलाश के फूल पंसद थे, पर नियति ने उसका दामन कांटों से भर दिया। क्या वह अपने दुखों से निजात पा सकी?
महुएकी सुगध समस्त वायुमंडल में धीमी गातिसे आ कर फ़ैल गयी।
झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य को तूलिका प्रायः मंत्रमुग्ध सी निहारती।
पलाश की कलियांखिल कर आग के जैसी लाल हो जातीं।
लाल नारंगी रंग के चटक पलाश के गुच्छे जिसके किनारे काली धारियां होतीं- उसे बेहद भाते।
पलाश के अद्धभुत सौंदर्य व् महुए की सुरभि ने उसे भावनाओ के सैलाब में बहा दिया।
खदान से लौटे ही उसके इंजीनियर पति महेंद्र उसे के आंचल को महुए से भर देते, महुए की सुगंध से वह बोरा उठती।
तभी उसे मनमोहक पलाश याद आ जाता है और वह महेंद्र की बांहें थाम मनुहार कर बैठती, “प्लीज़ पलाश की 2 टहनियां भी कभी-कभी लाया करो, इसका कुंदन सा सौंदर्य हमारे प्यार को जीवंत रखेगा,”
महेन्द्र अपने बैग से पलाश की टहनियां निकाल कर उसके सुकोमल हाथों में थमा देते, “पलाश के सौंदर्य दृश्य हमारे प्यार की तपिस है, इसे लाना भला कैसे भूल सकता हूं!”
पटना विश्वविद्यालय से तूलिका इतिहाश में एमए करब रही थी, उसके बचपन कक साथी महेंद्र सिंदरी में इंजीनिरिंग कर रहा था।
पड़ोसी होने से उनकी घनिष्टता बढ़ती गयी- उम्र की सीढियाँ फलांगते कब ह्रदयनमे प्यार का अंकुर फूटा इसका अहसास दोनों को नहीं हुआ।
पर इस बात का अहसास उन्हें अवश्य था की वे जन्म जन्म के साथी है।
सिंदरी से लौटते ही महेंद्र तूलिका से मिलने दरंभगा हाउस में अवस्थित पटना विश्वविदयालय चला जाता, तूलिका क्लब में होती- तो वह प्रतीक्षा की घड़ियां दरभंगा हाउस के पीछे बहती गंगा के सौदर्य को निहार कर बिताता, तूलिका के आते ही दोनों गंगा के किनारे सीढ़ियों पर जा बैठते- इस ओर सामने की अपेछाभीड़ काम होती, सामने की ओर विद्यार्थियों का जमघंट रहता।
“गंगा के सौदर्य को निहारने के लिए यह जगह बेहद अच्छी है,” महेंद्र ने हथेलियों से तूलिका पर पानी छिड़कते हुए कहा।
“पीरियड की समाप्ति पर मई प्रायः यहीं जाती हूं,” जानते हो दरभंगा हाउस में मंदिर भी बना हुआ है, शायद रानियां स्नान के बाद इसमें पूजा भी करती होंगी,” तूलिका ने लहरों से खेलते हुए कहा, तूलिका स्मृति के गलियारे में भटक रही थी कितभी कामवाली ने उसकी निंद्रा तोड़ी,” आज स्कूल जाने में आपको देर नहीँ होगी ? अब तक आपने तैयारी शुरू नहीं की ?
विशाल के लिए नाश्ते का प्रबध कर तूलिका स्नान के लिए चली गयी आज उसका जी चाहता है स्वयं समझने के खातिर आत्मलोकन करें कितना कुछ बीत गया इस बिच वक्त के साथ यादों की खिड़की खोलने से ह्रदय में एक तिस उठती है, उम्र के प्रत्येक पड़ाव पर कुछ छड़ पीछे मुड़कर देखने की इच्छा हुई, पर वक्त के बहाव के साथ वह आगे की ओर बढ़ती गयी।
महेंद्र तथा तूलिका के संबंध की खबर दोनों के परिवारों को थी, कहीं कोई रूकावट न थी सबको यह रिश्ता पसंद था, दोनों परिवारों ने सहर्षपूर्वक इस रिश्ते को मंजूरी दे दी, धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ, जगरखंड के खदान में महेंद्र नोकरी कर रहे थे, ब्याह के बाद दोनों हनीमून के लिए मसूरी चले गए सप्ताहभर वाहन की हरी भरी वादियों में दोनों घुमते रहे, दर्शनीय स्थलों को देखने में दिन कैसे बीत गए इसका पता उन्हें नहीं चला, मसूरी से लौटते ही महेंद्र और तूलिका धनबाद लौट आए।
महहेन्द्र की छुटियां खत्महो गयी थी, महेंद्र के दिनभर नहीं रहने पर तूलिका पत्र पत्रिकाओं में उलझी रहती, महेंद्र के घर लौटते ही वह खुस हो उठती, महेंद्र ने एक दिन खदान से लौटते ही तूलिका को खुस खबरी सुनायी- ” मांइस की तरफ से ट्रेनिंग के लिए मैं एक वर्ष के लिए विदेश जा रहा हूं।
“एक वर्ष के लिए ?” खुसी के साथ उदासी की लहर सी तूलिका के मन में छा गयी, ” समय बीतते देर नहीं लगती, तुम इस बिच पटना जा कर बीएड कर लो इच्छा होने पर शिक्षा के क्षेत्र में जा सकोगी,” तूलिका के लंबे लहराते बालों से अठखेलियां खेलते हुए महेंद्र ने कहा।
विदेश से लौटते ही महेंद्र तूलिका को पटना से लेन चले गए- सप्ताहभर पटना में रिश्तेदारों से मिलने में उन्हें बहुत अच्छा लगा पटना से लौटते ही तूलिका ने अपनी नोकरी के लिए प्रयास शुरू किए, बीएड कर लेने की वजह से स्थनीय स्कूल में शिक्षिका के पद पर उसकी नियुक्ति हो गयी, प्रतिभाशाली तूलिका के कर्तव्यनिष्ठा व् कर्मठता प्रशंसनीय थी। वह पूरी ईमानदरी से शिक्षण कार्य संभालती, अवकाश के क्षणों में वह उत्तर पुस्तिकाएं जांचती या अध्यन करती, परनिंद्र-परचर्चा में ब्यस्त शिक्षिकाएं अगर ईर्ष्यावश किनारा करतीं, तो कुछ शिक्षिकाएं उसके गुणों को आत्मसात करने की चेष्टा करतीं, उन्ही दिनों विशाल उसकी कोख में आ गया, रात की घनी नीरवता में सब कुछ धीमे धीमे सिमट गया तब महेंद्र को उसने पापा बनने की सूचना दी महेंन्न्द्र खुसी से बौरा उठे, उनकी आँखों में इंद्रधनुषी सपने तैर उठे उन्हें महसूस हुआ की एक नन्हा बच्चा उन्हें पापा कह कर पुकार रहा हो, अपार हर्ष से उनकी आँखें भर उठीं।
“पापा बनाना इतना सुखद होता है यह तो मैं जनता ही नहीं था, एक बात कहूंअगर बेटा हुआ, तो उसका नाम विशाल रखगें,” अनिवर्चनीय आनद से महेंद्र ने कहा।
महेंद्र ने दुसरे दिन तूलिका की जांच करवायी, उसने फोन पर अपनी माता पिता को यह खुशखबरी दे दी। तूलिका की देखभाल के लिए वे खबर पाते ही आ गए। उन दिनों महेंद्र अपना अधिकांश समय तूलिका के पास ही बिताते, उनकी पूरी कोशिश रहती किवे अपनी पत्नी कि पूरी देखभल स्वंय करें तूलिका कि स्मृतियां छलछला गयीं।
दोपहर कि उनींदी घड़ी में जब सारा परिवेश शांत हो जाता। तो उसे विवाह पूर्व महेंद्र के साथ बिताये पल बेहद याद आते, वर्षों के लंबे अंतराल में कितना कुछ बदल गया। उस समय प्रत्येक छात्र छात्रओं को ऑनर्स कि पढ़ाई करने के लिए कॉलेज और फिर स्नातकोत्तर कि पढ़ाई के लिए दरभंगा हाउस में पटना विश्वविदयालय में जाना पड़ता। कुछ वर्षों के बाद ऑनर्स कि पढ़ाई ज्यादातर कॉलेजों में होने लगी, उन सुनहरे दिनों के याद को सीने से लगाए उसे जीवन कि इस कँटीली पगडंडी पर चलने में हिम्मत और स्फूर्ति मिलती, समय के साथ साथ वह शिला सी दृढ़ होती गयी।
कुछ ही दिन पहले उसी मांइस में इंजीनियर के पद पर विशाल कि नियुक्ति हुई है, ड्यूटी से जब तक वह लौट कर नहीं आता तूलिका बरामदे में चक्कर लगती रहती है। महेंद्र कि प्रतीक्षा भी वह इसी प्रकार किया करती थी। अचानक उसके ह्रदय में एक हुक सी उठी। बिता हुआ कल आज बेहद याद आने लगा। उसके हाथ पांव शिथिल होने लगे चलचित्र की भातिं सारे दृश्य उसके सामने आने लगे- उस दिन उसकी तबीयत सुबहः से ही अच्छी नहीं लग रहीं थी। प्रसव वेदना की कल्पना से ही वह डर जाती। महेंन्द्र ने उसे बहुत समझाया, “ड्यूटी पर जाना अति आवश्यक है। थोड़ी देर के लिए जा रहा हूं, घर आकर सबके साथ लांच करूंगा। तूलिका ने महेंद्र की बांहें थाम लीं। उस मृदुल स्पर्श एंव आँखों की निरीह व् मूक वेदना ने मनो सब कुछ कह दिया।
” मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं, घबराना नहीं, ” सीने से तूलिका को लगते हुए महेंद्र ने कहा।
महेंद्र की प्रतीक्षा में तूलिका बरामदे में चक्कर लगा रही थी तभी उसे कुछ लोग बदहवास से भागते हुए दिखे।
एक दहशत सी चरों ओर फैलती जा रही थी, कुछ लोग सड़क पर बातें कर रहे थे। चिंतातुर तूलिका आ अंदर आकर अपने सास-ससुर को इस बात की सूचना दी।
ससुर जी क्षणभर में मोड़ पर खड़े उन लोगों के बीच जा पहुंचे तूलिका अपने सास के साथ गेट पर जा कर कड़ी हो गयी।
तभी ससुर जी आते दिखे, भय से पीले पड़ गए उनके छहरे को देखते हुए तूलिका ने आंशकाग्रस्त हो कर पूछा, ” क्या हुआ पाप ?”
” खदान में पानी भर आया है, बहुत से लोग उसमे फंस गए है, कुछ उन्हें बचने अंदर गए हैं, मैं फोन करके पूरी बात पता करता हूं।/”
तभी तूलिका को चक्कर आने लगे- भय से उसे उल्टियां होने लगीं।
” हमारे महेंद्र को कुछ नहीं होगा- तुम घबराओं नहीं,” महेंद्र के पिता जी ने उसे ढाढस बधांते हुए कहा, हालांकि वे भी अंदर से बेहद घबरा उठे, महेंद्र के पिता को फोन नहीं करना पड़ा, मांइस आये एक फोन ने उनकी दुनिया उजाड़ दी। तूलिका के आंखों के आगे अँधेरा छा गया ओर वह मूर्छित होकर गिर पड़ी। इस ढलती उम्र में पहाड़ जैसे दुःख को महेंद्र के माता-पिता भी सहन नहीं कर प् रहे थे। लोगों कि भीड़ उनके घर पर उमड़ने लगीं। मांइस से कुछ कर्मचारी महेंद्र के शव को ले ककर आ गए, उन लोगों के परिवार को सभांला, सभी सहायतार्थ आ गए।

” पलाश के इस रक्तिम फूल के पत्ते के रूप में मैं, तुम और विशाल रहेंगें-हम दो हमारे एक,”

तूलिका कि चिंताजानक दशा देख उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, उसे इस बात का होश नहीं रहा कि उसने पुत्र को जन्म दिया।
जीवन का अंधकारमय अध्याय अब तूलिका के सामने था। तूलिका के माता-पिता भी इस दुःख का भर वहन करने आ पहुंचें थे। कुछ दिनियों तक उन्होंने भी तूलिका को संभालने कि चेष्ट की, जवान पुत्र को कंधा देने के बाद महेंद्र के पिता ने बिस्तर पकड़ लिया, महेंद्र की मां पोते को गॉड में लेकर हमेशा रोती रहतीं।
तूलिका के सपने चूर हो चके थे। अब उसे आग की पगडंडियों पर चलना है। बिस्तर पर पड़े सास-ससुर की सेवा तथा नववजात का पालन-पोषण उसे करना है।
इन सब के साथ अपनी नोकरी को भी बचाए रखना है उसे साहस करना ही होगा, अन्यथा महेंद्र के सपने यों ही बिखर जाएंगे।
सुनहरे पलाश
अथक सेवा ओर डॉक्टरों के इलाज के बावजूद वह अपने ससुर को न बचा सकी, सास-बहू ने विशाल के पालन-पोषण करने में स्वयं को भुला दिया, घर के सारे काम निबटा के जब तूलिका स्कूल जाती, तो विशाल अपनी दादी के पास रहता, नियति उसे एक ओर आघात देनेवाली है, इस बात की खबर तूलिका को नहीं थी। एक रात तूलिका की सास जो सोयीं- तो फिर वे उठी नहीं। तूलिका पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। विशाल का पूरा जीवन उसके सामने था। महेंद्र के सामान ही उसकी उच्च शिक्षा कक प्रबन्ध उसे करना है। महेंद्र प्रायः उसे दिया करते, ” कभी भी संकट में इंसान को धैर्य नहीं खोना चाहिए। बाधाओं का डट कर मुकाबला करने से रास्ता आसान हो जाता है, जीवन में संघर्ष करना सीखों ”
महेंद्र की यादें अब उसके जीने का संबल थी, रिश्तेदारों ने सलाह दी थी। ‘ इस कच्चे उम्र में अकेले जीवन कांटना संभव नहीं, इसका ब्याह कर देना चाहिए।
सास-ससुर जानते थे की महेंद्र के प्रति पूर्ण निष्ठा से समर्पित तूलिका अपने सुख के खातिर दूसरा विवाह कभी नहीं करेगी, पति के प्रति उसकी अटूट निष्ठां से वे भलीभांति अवगत थे।
विशाल के रंग रूप में तूलिका को महेंद्र की छवि नजर आती। उसे महेंद्र के अनुरूप विशाल को गढ़ना है। उसने विशाल के देखभाल के लिए एक कामवाली को नगर में रख लिया। दिन बीत जाता- पर रात की तनहाई में महेंन्द्र की याद उसे बेहद सताती- रोते-रोते जब आँखें थक जातीं- तो उसे महसूस होता मानों महेंद्र उसे बाहुपाश में ले थपकियां दे रहें हों, इस ऊर्जा को पा कर जीवंत हो उठी।
तूलिका की दुनिया विशाल तक सीमित थी। अपने विषय में सोचने की उसे कभी इच्छा ही नहीं हुई, वह एक सरिता की भातिं विघ्रों को पर करती आगे बढ़ती गयी, संघर्षों के बीच उसने जिन सीख लिया था। समय के पांव तीव्र गति से भागते रहे, तूलिका का कठोर तप पूर्ण हुआ ओर विशाल ने भी अपनी इंजीनरिंग की पढ़ाई पूरी की, उसकी नियुक्ति भी उसी खदान में हुई।
अचानक स्कूटर रूकने के आवाज से वह अपने अतीत का दामन छोड़ वर्तमान में आ गयी, विशाल जैसे परिश्रम व् मेधवी पुत्र क्लो पा आज उसका सर गर्व से उच हो गया- उसके ओर महेंद्र के सपने पूरे हो गए, विशाल ने मां के आंचल में महुएके फूल भर दिए, तूलिका अवाक् रह गयी।
” तुम्हारी पसंद मुझे पता है मां,” विशाल ने पलाश की कुछ टहनियां उसे देते हुए कहा, खुसी से तूलिका की आँखें भर आयीं।
अचानक महेंद्र की बात उसके कानों में गूंजने लगीं, पलाश कके डंठल में तीन पत्ते होते है। वैसे ही इस रक्तिम वर्ण के फूल के पत्ते के रूप में मैं, तुम ओर विशाल रहेंगें-हम दो हमारे एक “
आज उन बातों को याद कर उसकी आंखें भर आयीं कि डंठल से एक पत्ता टूट गया। तभी उसे महसूस हुए कि विशाल के ब्याह के बाद डंठल फिर पत्ते लगेंगे। महेंद्र हमेशा उसके साथ है। विशाल के साइन पर सर रख कर उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।

About Pooja

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *