धान में ज्यादा कल्ले और पैदावार के लिए धान की खेती की पूरी जानकारी

  किसी भी फसल की उत्पादन को कम करने का एक बहुत बड़ा कारण उसमे लगने वाले रोग होते है। रोग उत्पादन को कम ही नहीं करते बल्कि उत्पादित फसल की गुणवत्ता को भी अच्छा खासा नुकसान पहुचाते है। जिससे फसल का बाजार मूल्य भी कम हो जाता है। रोगों की प्रवृति इस प्रकार होती है कि यह फसल के बीजों व उसके अवशेषों के जरिये पीढ़ी दर पीढ़ी किसी न किसी अवस्था में जीवित रहते है, इसलिए फसलो में लगने वाले रोगों को बारे में विशेष जानकारी का होना अत्यंत आवश्यक होता है, चूँकि हमारे देश का मुख्य भोजन चावल है इसलिए धान की फसल में लगने वाले रोगों तथा उनके नियंत्रण के बारे में हमारा जानना बहुत ज्यादा आवश्यक हो जाता है।

जायद में मूँग की खेती करने से धान की फसल में 15 किग्रा० नत्रजन (Urea) की बचत होता है। इसी प्रकार हरी खाद (सनई अथवा ढैंचा) से लगभग 40-60 किग्रा० नत्रजन की बचत होती है। अतः इस दिशा में नत्रजन (Urea) उर्वरक तद्नुसार प्रयोग करें। यदि कम्पोस्ट 10-12 टन का प्रयोग किया जाये तो उसमें भी तत्व प्राप्त होते हैं तथा मृदा का भौतिक सुधार होता है।

ऊसरीली क्षेत्र में हरी खाद के लिए ढैंचे की बुवाई करना विशेष रूप से लाभ प्रद होता है। 2 कुन्तल प्रति हेक्टर जिप्सम का प्रयोग बेसल के रूप में किया जा सकता है। इससे धान की फसल को गन्धक की आवश्यकता पूरी हो जायेगी। सिंगल सुपर फास्फेट के प्रयोग से भी गन्धक की कमी दूर की जा सकती है। पोटाश का प्रयोग बेसल ड्रेसिंग में किया जाय किन्तु हल्की दोमट भूमि में पोटाश उर्वरक को यूरिया के साथ टापड्रेसिंग में प्रयोग किया जाना उचित रहता है।

अतः ऐसी भूमि में रोपाई के समय पोटाश की आधी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए और शेष आधी मात्रा को दो बार में नत्रजन के साथ टाप-ड्रेसिंग करना चाहिए। जिन स्थानों में धान के खेतों में पानी रूकता हो और उसके निकास की सुविधा न हो रोपाई के समय ही सारा उर्वरक देना उचित होगा।

यदि किसी कारण वश यह सम्भव न हो तो ऐसे क्षेत्रों में यूरिया के 2-3 प्रतिशत घोल का छिड़काव दो बार कल्ला निकलते समय तथा बाली निकलने की प्रारम्भिक अवस्था पर करना लाभदायक होगा।

यूरिया की टाप-ड्रेसिंग के पूर्व खेत से पानी निकाल देना चाहिए और यदि किसी क्षेत्र में ये सम्भव न हो तो यूरिया को उसकी दुगुनी मिट्टी में एक चौथाई गोबर की खाद मिलाकर 24 घन्टे तक रख देना चाहिए। ऐसा करने से यूरिया अमोनियम कार्बोनेट के रूप में बदल जाती है और रिसाव द्वारा नष्ट नहीं होता है।

धान की खेती की पूरी जानकारी

धान में ज्यादा कल्ले और पैदावार के लिए क्या करे

चावल विश्व की ज्यादातर आबादी के आहार का प्रमुख स्रोत है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा एवं विटामिन्स होता है। देश में लगभग 4-4 करोड़ हैक्टेयर जमीन में धान  (चावल) की खेती 9 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है।

भूमि का चुनाव

धान कि खेती के लिए अच्छी उर्वरता वाली समतल व अच्छे जलधारण क्षमता वाली मटियार या चिकनी मिटटी सर्वोत्तम होती है सिचाई कि पर्याप्त सुबिधा होने पर हलकी भूमियों में भी धान कि खेती सफलता पूर्वक कि जा सकती है .

खेत की तैयारी

धान में ज्यादा कल्ले और पैदावार के लिए क्या करे

जिस खेत में धान कि रोपाई करनी हो उस खेत में अप्रैल मई में हरी खाद के लिए ढैंचे कि बुवाई 20-25 कि . ग्रा . बीज प्रति हे . कि दर से करे आवश्यकता अनुसार सिचाई करते रहे और जब 5-6 सप्ताह कि हो फसल जाए तो उसे मिटटी में अच्छी तरह मिला दे तथा खेत में पानी भर दे जिससे ढैचा अच्छी तरह से – गल सड़ जाए अगर हरी खाद का प्रयोग नहीं कर रहे तो 20-25 टन गली सड़ी गोबर कि खाद प्रति हे कि दर से खेत में . बिखेर कर अच्छी तरह जुताई करे.

जल प्रबन्ध

प्रदेश में सिंचन क्षमता के उपलब्ध होते हुए भी धान का लगभग 60-62 प्रतिशत क्षेत्र ही सिचिंत है, जबकि धान की फसल को खाद्यान फसलों में सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है।

फसल को कुछ विशेष अवस्थाओं में रोपाई के बाद एक सप्ताह तक कल्ले फूटने, बाली निकलने फूल, खिलने तथा दाना भरते समय खेत में पानी बना रहना चाहिए।

फूल खिलने की अवस्था पानी के लिए अति संवेदनशील हैं। परीक्षणों के आधार पर यह पाया गया है कि धान की अधिक उपज लेने के लिए लगातार पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है इसके लिए खेत की सतह से पानी अदृश्य होने के एक दिन बाद 5-7 सेमी० सिंचाई करना उपयुक्त होता है।

यदि वर्षा के अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे तो सिंचाई अवश्य करें। खेत में पानी रहने से फास्फोरस, लोहा तथा मैंगनीज तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है और खरपतवार भी कम उगते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कल्ले निकलते समय 5 सेमी० से अधिक पानी अधिक समय तक धान के खेत में भरा रहना भी हानिकारक होता है। अतः जिन क्षेत्रों में पानी भरा रहता हो वहॉ जल निकासी का प्रबन्ध करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा उत्पादन पर कुप्रभाव पडेगा।

सिंचित दशा में खेत में निरन्तर पानी भरा रहने की दशा में खेत से पानी अदृश्य होने की स्थिति में एक दिन बाद 5 से 7 सेमी० तक पानी भर दिया जाय इससे सिंचाई के जल में भी बचत होगी।

इस विधि से सब्जियों की खेती करें, अच्छा लाभ होगा

बीज शोधन

  • नर्सरी डालने से पूर्व बीज शोधन अवश्य कर लें।
  • इसके लिए जहां पर जीवाणु झुलसा या जीवाणु धारी रोग की समस्या हो वहां पर 25 किग्रा० बीज के लिए 4 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट या 40 ग्राम प्लान्टोमाइसीन को मिलाकर पानी में रात भर भिगो दें।
  • दूसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी डालें।
  • यदि शाकाणु झुलसा की समस्या क्षेत्रों में नहीं है तो 25 किग्रा० बीज को रातभर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन निकाल कर अतिरिक्त पानी निकल जाने के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेन्डाजिम को 8-10 लीटर पानी में घोलकर बीज में मिला दिया जाये
  • इसके बाद छाया में अंकुरित करके नर्सरी में डाली जाये। बीज शोधन हेतु 5 ग्राम प्रति किग्रा० बीज ट्राइकोडरमा का प्रयोग किया जाये।

नर्सरी

  1. एक हेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई के लिए 800-1000 वर्ग मी० क्षेत्रफल में महीन धान का 30 किग्रा० मध्यम धान का 35 किग्रा० और मोटे धान का 40 किग्रा० बीज पौध तैयार करने हेतु पर्याप्त होता है।
  2. ऊसर भूमि में यह मात्रा सवा गुनी कर दी जाय। एक हेक्टर नर्सरी से लगभग 15 हेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई होती है। समय से नर्सरी में बीज डालें और नर्सरी में 100 किग्रा० नत्रजन तथा 50 किग्रा० फास्फोरस प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें।
  3. ट्राइकोडर्मा का एक छिड़काव नर्सरी लगने के 10 दिन के अन्दर कर देना चाहिए। बुवाई के 10-14 दिन बाद एक सुरक्षात्मक छिड़काव रोगों तथा कीटों के बचाव हेतु करें
  4. खैरा रोग के लिए एक सुरक्षात्मक छिड़काव 5 किग्रा० जिंक सल्फेट का 20 किलो यूरिया या 2.5 किग्रा० बुझे हुए चूने के साथ 1000 लीटर पानी के साथ प्रति हेक्टर की दर से पहला छिड़काव बुवाई के 10 दिन बाद एवं दूसरा 20 दिन बाद करना चाहिए।
  5. सफेदा रोग के नियंत्रण हेतु 4 किलो फेरस सल्फेट का 20 किलो यूरिया के घोल के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
  6. झोंका रोग की रोकथाम के लिए 500 ग्राम कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू०पी० का प्रति हे० छिड़काव करें तथा भूरे धब्बे के रोग से बचने के लिए 2 किलोग्राम मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू०पी० का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें
  7. नर्सरी में लगने वाले कीटों से बचाव हेतु 1.25 लीटर क्लोरोपाइरोफास 20 ई०सी० प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें। नर्सरी में पानी का तापक्रम बढ़ने पर उसे निकाल कर पुनः पानी देना सुनिश्चित करें।

सीधी बुवाई

मैदानी क्षेत्रों में सीधी बुवाई की दशा में 90 से 110 दिन में पकने वाली प्रजातियों को चुनना चाहिए। बुवाई मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक समाप्त कर देना चाहिए। 40 से 50 किग्रा० बीज प्रति हेक्टर की दर से 20 सेमी० की दूरी पर लाइनों में बोना चाहिए। पंक्तियों में बुवाई करने से यांत्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण में सुविधा होती है तथा पौध सुरक्षा उपचार भी सुगमतापूर्वक किये जा सकते हैं। इस विधि से बुवाई करने पर पौधों की संख्या भी सुनिश्चित की जा सकती है।

यदि लेव लगाकर धान की बुवाई करनी हो तो 100 से 110 किग्रा० बीज प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें। बीज को 24 घण्टे पानी में भिगोकर 36-48 घण्टे तक ढेर बनाकर रखना चाहिए जिससे बीज में अंकुरण प्रारम्भ हो जाय। इस अंकुरित बीज को खेत में लेव लगाकर दो सेमी० खड़े पानी में छिड़कवां बोया जाना चाहिए। आगरा मण्डल में, जहां कुओं का पानी खारा है और धान की पौध अच्छी प्रकार तैयार नहीं हो सकती, इस विधि को अपनाना ज्यादा अच्छा है।

समय से रोपाई

130-140 दिन में पकने वाली धान की प्रजातियों जैसे पन्त 12, पन्त धान-4 और सरजू-52 आदि की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य तक अवश्य कर लेनी चाहिए, अन्यथा उसके बाद उपज में निरन्तर कमी होने लगती है। यह कमी 30-40 किग्रा० प्रतिदिन प्रति हेक्टर होती है।

शीघ्र पकने वाली प्रजातियों जैसे साकेत-4, प्रसाद, गोविन्द, मनहर पंत-10, आई०आर-36 आदि की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक की जा सकती है। देर से पकने वाली प्रजातियां जैसे क्रांस-116, टा-100,टा-22, तथा सुगन्धित धान जैसे टा-3, एन-12 आदि की रोपाई जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक की जानी चाहिए।

अधिक उपज देने वाली सुगन्धित किस्में जैसे पूसा बासमती-1 की रोपाई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए।

क्वारी और कार्तिकी धान की बौनी प्रजातियों को 21-25 दिन की पौध की रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। देशी तथा देर से पकने वाली प्रजातियों को 30-35 दिन की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त होती है।

ऊसर में रोपार्इ हेतु 35 दिन की पौध का प्रयोग करें तथा एक स्थान पर 2 से 3 पौधे लगायें तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 सेमी० रखी जाय। शीघ्र मध्यम एवं विलम्ब से पकने वाली प्रजातियों की नर्सरी की रोपाई विषम परिस्थितियों में क्रमशः 30-35, 40-45 एवं 50-55 दिनों में की जा सकती है।

स्वर्णा, सोना महसूरी व महसूरी की मई के अन्त से 15 जून तक रोपाई कर देनी चाहिए। विलम्ब से रोपाई करने से फूल आने में कठिनाई होती है।

 उचित गहराई व दूरी पर रोपाई

बौनी प्रजातियों की पौध की रोपाई 3-4 सेमी० से अधिक गहराई पर नहीं करना चाहिए। अन्यथा कल्ले कम निकलते है और उपज कम हो जाती है। साधारण उर्वरा भूमि में पंक्तियों व पौधों की दूरी 20×10 सेमी० उर्वरा भूमि में 20×15 सेमी० रखें। एक स्थान पर 2-3 पौध लगाने चाहिए। यदि रोपाई में देर हो जाय तो एक स्थान पर 3-4 पौध लगाना उचित होगा। साथ ही पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 5 सेमी० कम कर देनी चाहिए। इस बात पर विशेष ध्यान दें कि प्रति वर्ग मीटर क्षेत्रफल में सामान्य स्थिति में 50 हिल अवश्य होना चाहिए ऊसर तथा देर से रोपाई की स्थिति में 65-70 हिल होनी चाहिए।

धान में फसल सुरक्षा

धान में फसल सुरक्षा

धान के प्रमुख कीटः
(क)असिंचित दशा में(ख)सिंचित दशा में
1दीमक1दीमक
2जड़ की सूड़ी2जड़ की सूड़ी
3पत्ती लपेटक3नरई कीट
4गन्धी बग4पत्ती लपेटक
5सैनिक कीट5हिस्पा
6बंका कीट
7तना बेधक
8हरा फुदका
9भूरा फुदका
10सफेद पीठ वाला फुदका
11गन्धी बग
12सैनिक कीट
  • दीमकः यह एक सामाजिक कीट है तथा कालोनी बनाकर रहते हैं। यह कालोनी में लगभग 90 प्रतिशत श्रमिक, 2-3 प्रतिशत सैनिक, एक रानी व एक राजा होते हैं। श्रमिक पीलापन लिये हुए सफेद रंग के पंखहीन होते है जो उग रहे बीज, पौधों की जड़ों को खाकर क्षति पहुँचाते हैं।
  • जड़ की सूड़ीः इस कीट की गिडार उबले हुए चावल के समान सफेद रंग की होती है। सूड़ियॉ जड़ के मध्य में रहकर हानि पहुँचाती है जिसके फलस्वरूप पौधे पीले पड़ जाते हैं।
  • नरई कीट (गाल मिज): इस कीट की सूड़ी गोभ के अन्दर मुख्य तने को प्रभावित कर प्याज के तने के आकार की रचना बना देती है, जिसे सिल्वर शूट या ओनियन शूट कहते हैं। ऐसे ग्रसित पौधों में बाली नहीं बनती है।
  • पत्ती लपेटक कीटः इस कीट की सूड़ियॉ प्रारम्भ में पीले रंग की तथा बाद में हरे रंग की हो जाती हैं, जो पत्तियों को लम्बाई में मोड़कर अन्दर से उसके हरे भाग को खुरच कर खाती हैं।
  • हिस्पाः इस कीट के गिडार पत्तियों में सुरंग बनाकर हरे भाग को खाते हैं, जिससे पत्तियों पर फफोले जैसी आकृति बन जाती है।प्रौढ़ कीट पत्तियों के हरे भाग को खुरच कर खाते हैं।
  • बंका कीटः इस कीट की सूड़ियॉ पत्तियों को अपने शरीर के बराबर काटकर खोल बना लेती हैं तथा उसी के अन्दर रहकर दूसरे पत्तियों से चिपककर उसके हरे भाग को खुरचकर खाती हैं।
  • तना बेधकः इस कीट की मादा पत्तियों पर समूह में अंडा देती है। अंडों से सूड़ियां निकलकर तनों में घुसकर मुख्य सूट को क्षति पहुँचाती हैं, जिससे बढ़वार की स्थिति में मृतगोभ तथा बालियां आने पर सफेद बाली दिखाई देती हैं।
  • हरा फुदकाः इस कीट के प्रौढ़ हरे रंग के होते हैं तथा इनके ऊपरी पंखों के दोनों किनारों पर काले बिन्दु पाये जाते हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों से रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं, जिससे प्रसित पत्तियां पहले पीली व बाद में कत्थई रंग की होकर नोक से नीचे की तरफ सूखने लगती हैं।
  • भूरा फुदकाः इस कीट के प्रौढ भूरे रंग के पंखयुक्त तथा शिशु पंखहीन भूरे रंग के होते हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनो ही पत्तियों एवं किल्लों के मध्य रस चूस कर छति पहॅुचाते हैं, जिससे प्रकोप के प्रारम्भ में गोलाई में पौधे काले होकर सूखने लगते हैं, जिसे ‘हापर बर्न’ भी कहते हैं।
  • सफेद पीठ वाला फुदकाः इस कीट के प्रौढ़ कालापन लिये हुए भूरे रंग के तथा पीले शरीर वाले होते हैं। इनके पंखों के जोड़कर सफेद पट्टी होती है। शिशु सफेद रंग के पंखहीन होते हैं तथा इनके उदर पर सफेद एवं काले धब्बे पाये जाते हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनो ही पत्तियों एवं किल्लों के मध्य रस चूसते हैं, जिससे पौधे पीले पड़कर सूख जाते हैं।
  • गन्धी बगः इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ लम्बी टांगो वाले भूरे रंग के विशेष गन्ध वाले होते हैं, जो बालियों की दुग्धावस्था में दानों में बन रहे दूध को चूसकर क्षति पहूँचाते हैं। प्रभावित दानों में चावल नहीं बनते हैं।
  • सैनिक कीटः इस कीट की सूड़ियाँ भूरे रंग की होती हैं, जो दिन के समय किल्लों के मध्य अथवा भूमि की दरारों में छिपी रहती हैं। सूड़ियाँ शाम को किल्लों अथवा दरारों से निकलकर पौधों पर चढ़ जाती हैं तथा बालियों को छोटे–छोटे टुकड़ों में काटकर नीचे गिरा देती हैं।

नियंत्रण के उपाय

  • खेत एवं मेंड़ों को घासमुक्त एवं मेड़ों की छटाई करना चाहिए।
  • समय से रोपाई करना चाहिए।
  • फसल की साप्ताहिक निगरानी करना चाहिए।
  • कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण हेतु शत्रु कीटों के अण्डों को इकट्ठा कर बम्बू केज-कम-परचर में डालना चाहिए।
  • दीमक बाहुल्य क्षेत्र में कच्चे गोबर एवं हरी खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • फसलों के अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए।
  • उर्वरकों की संतुलित मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए।
  • जल निकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  • भूरा फुदका एवं सैनिक कीट बाहुल्य क्षेत्रों में 20 पंक्तियों के बाद एक पंक्ति छोड़कर रोपाई करना चाहिए।
  • अच्छे जल निकास वाले खेत के दोनों सिरों पर रस्सी पकड़ कर पौधों के ऊपर से तेजी से गुजारने से बंका कीट की सूड़ियॉ पानी में गिर जाती हैं, जो खेत से पानी निकालने पर पानी के साथ बह जाती हैं।
  • तना बेधक कीट के पूर्वानुमान एवं नियंत्रण हेतु 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हे० प्रयोग करना चाहिए।
  • नीम की खली 10 कु०प्रति हे० की दर से बुवाई से पूर्व खेत में मिलाने से दीमक के प्रकोप में धीरे-धीरे कमी आती है।
  • ब्यूवेरिया बैसियाना 1.15 प्रतिशत बायोपेस्टीसाइड (जैव कीटनाशी) की 2.5 किग्रा० प्रति हे० 60-75 किग्रा० गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से दीमक सहित भूमि जनित कीटों का नियंत्रण हो जाता है।
  • यदि कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पार कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
  1. दीमक एवं जड़ की सूड़ी के नियंत्रण हेतु क्लोरोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई०सी० 2.5 ली०प्रति हे० की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए। जड़ की सूड़ी के नियंत्रण के लिए फोरेट 10 जी 10 कि०ग्रा० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में बुरकाव भी किया जा सकता है।
  2. नरई कीट के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
    • कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 कि०ग्रा० प्रति हे० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में।
    • फिप्रोनिल 0.3 जी 20 कि०ग्रा० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में।
    • क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई०सी० 1.25 लीटर।
  3. हरा, भूरा एवं सफेद पीठ वाला फुदका के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
    • एसिटामिप्रिट 20 प्रतिशत एस०पी० 50-60 ग्राम/हे० 500-600 ली० पानी में घोलकर छिड़काव करें।
    • कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 कि०ग्रा० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में।
    • फिप्रोनिल 0.3 जी 20 कि०ग्रा० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में।
    • इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस०एल० 125 मि०ली०।
    • मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस०एल० 750 मि०ली०।
    • फास्फामिडान 40 प्रतिशत एस०एल० 875 मि०ली०।
    • थायामेथोक्सैम 25 प्रतिशत डब्ल्यू०जी० 100 ग्राम।
    • डाईक्लोरोवास 76 प्रतिशत ई०सी० 500 मि०ली०।
    • क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई०सी० 1.50 लीटर।
    • क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई०सी० 1.50 लीटर।
    • एजाडिरेक्टिन 0.15 प्रतिशत ई०सी० 2.50 लीटर।
  4. तना बेधक, पत्ती लपेटक, बंका कीट एवं हिस्सा कीट के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
    • बाईफेन्थ्रिन 10 प्रतिशत ई०सी० 500 मिली०/हे० 500 ली पानी में घोलकर छिड़काव करें।
    • कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 कि०ग्रा० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में।
    • कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी 18 कि०ग्रा० 3-5 सेमी० स्थिर पानी में।
    • क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई०सी० 1.50 लीटर।
    • क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई०सी० 1.50 लीटर।
    • ट्राएजोफास 40 प्रतिशत ई०सी० 1.25 लीटर।
    • मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस०एल० 1.25 लीटर।
  5. गन्धी बग एवं सैनिक कीट के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरकाव करना चाहिए।
    • मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत धूल 20-25 कि०ग्रा०।
    • मैलाथियान 5 प्रतिशत धूल 20-25 कि०ग्रा०।
    • फेनवैलरेट 0.04 प्रतिशत धूल 20-25 कि०ग्रा०।
  6. गन्धी बग के नियंत्रण हेतु एजाडिरेक्टिन 0.15 प्रतिशत ई०सी० की 2.50 लीटर मात्रा प्रति हे० 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना लाभप्रद होता है।

प्रमुख खरपतवार

(क) जल भराव की दशा में: होरा घास, बुलरस, छतरीदार मोथा, गन्ध वाला मोथा, पानी की बरसीम आदि।

(ख) सिंचित दशा में:

1. सकरी पत्ती- सांवा, सांवकी, बूटी, मकरा, कांजी, बिलुआ कंजा आदि।

2. चौड़ी पत्ती- मिर्च बूटी, फूल बूटी, पान पत्ती, बोन झलोकिया, बमभोली, घारिला, दादमारी, साथिया, कुसल आदि।

नियंत्रण के उपाय

शस्य क्रियाओं द्वाराः शस्य क्रियाओं द्वारा खरपतवार नियंत्रण हेतु गर्मी में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई, फसल चक्र अपनाना, हरी खाद का प्रयोग, पडलिंग आदि करना चाहिए।

यॉत्रिक विधिः इसके अन्तर्गत खुरपी आदि से निराई-गुडाई कर भी खरपतवार नियंत्रित किया जा सकता है।

रासायनिक विधिः इसके अन्तर्गत विभिन्न खरपतवारनाशी रसायनों को फसल की बुवाई/रोपाई के पश्चात संस्तुत मात्रा में प्रयोग किया जाता है, जो तुलनात्मक दृष्टि से अल्पव्ययी होने के कारण अधिक लाभकारी व ग्राह्य है।

    • 1. नर्सरी में खरपतवार नियंत्रण हेतु प्रेटिलाक्लोर 30.7 प्रतिशत ई०सी० 500 मिली० प्रति एकड़ की दर से 5-7 किग्रा० बालू में मिला कर पर्याप्त नमी की स्थिति में नर्सरी डालने के 2-3 दिन के अन्दर प्रयोग करना चाहिए।
    • 2. सीधी बुवाई की स्थिति में प्रेटिलाक्लोर 30.7 प्रतिशत ई०सी० 1.25 लीटर बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर अथवा बिसपाइरीबैक सोडियम 10 प्रतिशत एस०सी० 0.20 लीटर बुवाई के 15-20 दिन बाद प्रति हे० की दर से नमी की स्थिति में लगभग 500 लीटर पानी में घोलकर फ्लैट फैन नॉजिल से छिड़काव करना चाहिए।
    • 3. रोपाई की स्थिति में- सकरी एवं चौड़ी पत्ती दोनों प्रकार के खरपतवारों के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित रसायनों में से किसी एक रसायन की संस्तुत मात्रा को प्रति हे० लगभग 500 लीटर पानी में घोलकर फ्लैट फैन नॉजिल से 2 इंच भरे पानी में रोपार्इ के 3-5 दिन के अन्दर छिड़काव करना चाहिए।
1. ब्यूटाक्लोर 50 प्रतिशत ई०सी०3-4 लीटर
2. एनीलोफास 30 प्रतिशत ई०सी०1.25-1.50 लीटर
3. प्रेटिलाक्लोर 50 प्रतिशत ई०सी०1.60 लीटर
4. पाइराजोसल्फ्यूरान इथाईल 10 प्रतिशत डब्लू०पी०0.15 किग्रा०
5. बिसपाइरीबैक सोडियम 10 प्रतिशत एस०सी० 0.20 लीटर रोपाई के 15-20 दिन बाद नमी की स्थिति में
    • 4. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु निम्नलिखित रसायनों में से किसी एक रसायन की संस्तुत मात्रा को प्रति हे० लगभग 500 लीटर पानी में घोलकर फ्लैट फैन नॉजिल से बुवाई के 25-30 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए-
1. मेटसल्फ्यूरान मिथाइल 20 प्रतिशत डब्लू०पी०20 ग्राम
2. इथाक्सी सल्फ्यूरान 15 प्रतिशत डब्लू०डी०जी०100 ग्राम
3. 2,4-डी इथाइल ईस्टर 38 प्रतिशत ई०सी०2.5 लीटर

उपज

समस्त  उपर्युक्त   क्रियाओं  – व प्रजातियाँ अपनाने पर शीघ्र पकने वाली प्रजातियों कि प्रति हे . औसत उपज 40-5 क्विंटल मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों 50-60 प्रति हे से उपज . है और संकर धान से 60-70 हे किन्टल /. उपज है .

भण्डारण

मड़ाई के बाद दानों कि सफाई कर लेते है सफाई के बाद धान के दानों को अच्छी तरह सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिए भण्डारण से पूर्व दानों को 12% नमी तक सुखा लेते है .

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