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दुष्टवा तु पाण्डवानींक व्यूढं
दुर्योंधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगमय राजा
वचनब्रवीत।। ( 1-2 )

उस समय राजा दुर्योंधन ने वयूहरचनायुक्त पांडवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा, दैत्य का आचरण ही द्रोणाचार्य हैं।
जब जानकारी हो जाती हैं, कि हम परमात्मा से अलग हो गए है, ( यही दैत्य का भान हैं ), वहां उसकी प्राप्ति के लिए तडप पैदा हो जाती हैं, तभी हम गुरू कि तलाश में निकलते हैं।
दोनों प्रवृतियों के बीच यही प्राथमिक गुरू हैं, यधपि बाद के सद्गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण होंगे, जो योग कि स्थितिवाले होंगे।राजा दुर्योधन आचार्य के पास जाता हैं। मोहरुपी दुर्योधन।मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल हैं, राजा हैं।दुर्योधन- दुर अर्थात दूषित, यो धन अर्थात वह धन।आत्मिक सम्पति ही स्थिर सम्पति हैं।
उसमे जो दोष उतपन्न करता हैं वह हैं मोह। यही प्रकृति की ओर खिंचता हैं ओर वास्तविक जानकारी के लिए प्रेरणा प्रदान करता हैं।
मोह है, तभी तक पूछने का प्रश्न भी हैं, अन्यथा सभी पूर्ण ही हैं।

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