घरेलु नुस्खे

गला बैठना, गले में खराश, गले में कुछ भी निगलने पर होने वाले दर्द का परिचय और निजात पाने के उपाय.

कई बार खांसी जुकाम की वजह से या कुछ गलत खान पान से हमारे गले में भयंकर समस्या आ जाती हैं, और समस्या इतनी भयंकर हो जाती हैं के हम कुछ खा भी नहीं सकते. आज हम आपको बताएँगे ऐसी ही गले की भयंकर समस्याएं और किसी भी प्रकार के इन्फेक्शन जैसे टॉन्सिल नया या पुराना, गला बैठना, गले में खराश, गले में कुछ भी निगलने पर होने वाले दर्द का परिचय और निजात पाने के उपाय.

क्या है गले का रोग?

गले के रोग एक प्रकार का श्वसन संबंधी इंफेक्शन है जो ऊपरी वायु मार्ग (श्वसन तंत्र के) के वायरल इंफेक्शन द्वारा होता है. इंफेक्शन के चलते गले के भीतर सूजन हो जाती है. सूजन के कारण सामान्य श्वसन में बाधा उत्पन्न होती है; “भौंकने वाली”खांसी, स्ट्रिडोर (तेज़ घरघराहट की ध्वनि), तथा स्वर बैठना/गला बैठना गले के रोग के मुख्य लक्षण हैं.

गले के रोग के लक्षण हल्के, मध्यम या गंभीर हो सकते हैं तथा रात के समय ये बदतर हो जाते हैं. मौखिक स्टीरॉयड की एक खुराक स्थिति का उपचार कर सकती है. कभी-कभार, एपाइनफ्राइन अधिक गंभीर मामलों के लिये उपयोग की जाती है. अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता बेहद कम पड़ती है.

gale ke rog

गले के रोग का कारण-

गले के रोग वायरस इंफेक्शन के कारण उत्पन्न होता है. इस रोग को गंभीर लैरिंगोट्रेकाइटिस, स्पैस्मोडिक क्रुप, लैरेन्जियल डिफ्थीरिया, बैक्टीरियल ट्रैन्काइटिस, लैरियेंगोट्राकियोब्रॉन्काइटिस और लैरियेंगोट्रैकोब्रॉन्कोन्यूमोनाइटिस के नाम से भी जानते हैं.

इसके पहली दो स्थितियां वायरस से संबंधित है और लक्षण भी मामूली होते हैं. वहीं इसके आखिरी चार स्थितियां बैक्टीरिया से संबंधित हैं जो अधिक गंभीर होती है.

क्र.म गले के रोग परिचय
1 अन्ननली का सिकुड़ना जब गले की मांसपेशियों और आहार नली के तन्तुओं में दोष पैदा हो जाते हैं तो आहार नली फैलने और सिकुड़ने (संकुचन और प्राकुचन) की क्रिया ठीक से नहीं करती
2 गले में दर्द विभिन्न कारणों से गले में दर्द होता है जैसे- किसी चीज से गले पर चोट लगती है, गला छील जाता है
3 गले में सूजन, पीड़ा और खुश्की अक्सर ज्यादा धूम्रपान करने (बीड़ी, सिगरेट पीने से), शराब पीने, खाने में ठंडी चीजे खाने से, ठंडी चीजों के खाने के बाद तुरंत ही गर्म चीजें खाने से, पेट में बहुत ज्यादा कब्ज रहने से, गले में सूजन, दर्द, खुश्की तथा थूक निगलने में परेशानी या गला बैठ जाना आदि रोग पैदा हो जाते हैं।
4 स्वरभंग (गला बैठना) अस्पष्ट आवाज (खराब आवाज), कर्कश स्वर (भारी आवाज) को स्वरभंग या गला बैठना कहते हैं।
5 टांसिल बढ़ना गले के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मांस की एक गांठ सी होती है, जो लसिका ग्रंथि के समान होती है जिसे टांसिल कहते हैं।
6 अन्ननली का प्रदाह जब इस आहार नली में जलन होने लगती हैं तो उसे अन्न नली की जलन कहते हैं।
7 गलकोष प्रदाह इस रोग में मुंह के अन्दर जीभ के पास के सभी स्थान फूल जाते हैं। गोंद की तरह चिपचिपा सा बलगम गले में चिपका रहता है। गलकोष पककर जख्म हो जाता है कुछ भी निगलने या पीने में बड़ा दर्द या जलन होने लगती है।
8 घेंघा (गलगंड) घेंघा का रोग अधिकतर आयोडीन की कमी से होता है। कभी-कभी थायरॉयड ग्रंथि के बढ़ने के कारण भी ऐसा होता है। इस रोग में गर्दन या ठोड़ी में छोटी या बड़ी सूजन लटकती है।
9 कण्ठ शालूक इस रोग में रोगी के नाक और गले के बीच में एक मोटी सी गांठ बन जाती है। जिसके कारण रोगी को बार-बार जुकाम हो जाता है और नाक भी बंद हो जाती है। रोगी को मजबूर होकर मुंह से सांस लेनी पड़ती है। रोगी को सुनाई देना भी कम हो जाता है।
10 तुण्डिका शोथ बच्चों के गले में थोड़ी सी लापरवाही से तुण्डिका शोथ अर्थात टांसिल की बीमारी हो सकती है। एक बार तुण्डिका शोथ (टॉन्सिल) होने पर लंबे समय तक यह बीमारी चलती रहती है। जवानी में भी तुण्डिका शोथ (टॉन्सिल) की बीमारी हो सकती है।
11 कंठमाला कंठमाला एक गले का रोग है जो गिल्टियों के रूप में उत्पन्न होता है। इसमें जलन होती है। इन गिल्टियों के बढ़ने के साथ बुखार बना रहता है।
12 कण्ठमूल ग्रंथि शोथ शीशे में देखने पर गले के अंदर जीभ के ऊपर या मुंह में तालु के बगल में सुपारी के जैसी सूजन दिखाई पड़ती है जोकि टांसिल की वृद्धि को दिखलाती है।
13 विनसेण्ट एनजाइना विनसेण्ट एनजाइना में गले की टांसिलों पर सफेद रंग की झिल्ली बन जाती है। झिल्ली के नीचे जख्म बन जाता है। जिसमें से कभी-कभी बदबू भी आने लगती है। यह रोग 8 से 10 दिनों में ठीक होता है।
14 स्वरयंत्र शोथ या प्रदाह स्वरयंत्र यानी आवाज की नली की श्लैष्मिक झिल्ली में जब सूजन आ जाती है तो उसे स्वर यंत्र प्रदाह (गले में जलन) अथवा स्वर यंत्र शोथ (गले में सूजन) कहते हैं।
15 प्यास अधिक लगना प्यास (तृष्णा) एक रोग है जो अत्यधिक प्यास से उत्पन्न होता है। अत्यधिक परिश्रम करने पर या बुखार होने पर शरीर में पानी की कमी हो जाती है। शरीर में पानी की कमी होने पर पानी की कमी को दूर करने के लिए प्यास लगती है जिसे प्यास (तृष्णा) कहते हैं।

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