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भगवत गीता के अनमोल वचन ‘‘ईश्वर का निवास"

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भगवत गीता के अनमोल वचन ‘‘ईश्वर का निवास‘‘

भगवत गीता के अनमोल वचन – गीता मे लिखे उपदेश किसी एक मनुष्य विशेष या किसी खास  धर्म के लिए नही है, इसके उपदेश तो पूरे जग के लिए है। आज से हज़ारो साल पहले महाभारत के युद्ध मे जब अर्जुन अपने  ही भाईयों के विरुद्ध लड़ने के विचार से कांपने लगते हैं, तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का  उपदेश दिया था। कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि यह संसार एक बहुत बड़ी युद्ध भूमि है,  असली कुरुक्षेत्र तो तुम्हारे अंदर है। अज्ञानता या अविद्या धृतराष्ट्र है, और हर  एक आत्मा अर्जुन है। और तुम्हारे अन्तरात्मा मे श्री कृष्ण का निवास है, जो इस रथ  रुपी शरीर के सारथी है। ईंद्रियाँ इस रथ के घोड़ें हैं। अंहकार, लोभ, द्वेष ही  मनुष्य के शत्रु हैं।

गीता का अटूट ज्ञान ‘‘ईश्वर का निवास”

ईश्वर का निवास : गीता का अटूट ज्ञान “ईश्वर का निवास” हम और आप जैसा कि जानते है कि गीता में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण काई प्रश्न पूछे पर गीता के समापन से पूर्व जब अर्जुन के पास कोई प्रश्न रहा, तो भगवान ने स्वयं पूछा,    ‘अर्जुन जानते हो भगवान कहां रहते है?    आगे स्वयं ही इसका उत्तर देते हैं-

ईश्वार:  सर्वभूतानां  हृददेशेअर्जुन  तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारुढानि मायया।।

‘‘यह श्लोक गीता के अध्याय 18 में श्लोक संख्या 61 पर दिया हुआ है।

                                             ‘‘ईश्वर का निवास”

‘‘अर्जुन वह ईश्वर, परमतत्व परमात्मा समास्त भूतों के हृदय-देश में निवाश करता है। भूता का अर्थ प्राणी से होता है, अर्थात ईश्वर प्राणिमात्र के हृदय-देश में निवास करता है।
‘ भूत ‘ वैदिक कल का बहुत सम्मानित शब्द है भूत अर्थात प्राणी। ईश्वर प्राणिमात्र के हृदय-देश में निवास करता है। हृदय के अंदर इतना समीप है। फिर लोगा देखते क्यों नहीं?
भगवान कहते हैं- लोग मायारूपी यंत्र में आरूढ होकर भ्रमवश भटकते ही रहते है। इसलिए नहीं देख पाते। मायारूपी यंत्र में वे स्वयं दौडकर चढ जाते हैं।
मायारूपी नाव में, उन्हें कितना भी समझाएं दिन भर ज्ञान सुनेंगे, लेकिन कोई न काई पैतरा भांजकर सुरा-सुंदरी में उलझ जाएंगे।  जब ईश्वर हृदय में हैं,   तो हम शरण किसकी जाएं?  अब आगे भगवान कहते है-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।

तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्यस्यसि शाश्वतम् ।।

‘‘यह श्लोक गीता के अध्याय 18 में श्लोक संख्या 62 पर दिया हुआ है।

‘‘अर्जुन उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण में जाओ। “सर्वभावेन” – संपूर्ण भावों से जाओ। ‘‘मन‘‘ एक है। इसलिए उसे कई जगह मत लगाओ। इस प्रकार कल्याण नहीं होगा। संपूर्ण भावों से हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ।

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