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बेटी की कहानी

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जैसे ही पता चला तो खुश तो बहुत हुए दोनों। मगर एक फांस-सी भी चुभ ही रही थी कि ”अगर लड़की हुई तो?”
यह प्रश्न बडा भीमकाय था। पर्वत की तरह सामने खड़ा था रस्ता रोके। पहले से ही तो हैं दो-दो! और अब ऊपर से यह तीसरी भी हुई तो?

हे भगवान ! सोचते ही उन्हें चक्कर-से आ गए जैसे। और तय हुआ कि शहर चल कर जांच करा ही ली जाए। बेकार में ही रिस्क क्यों लेना? खतरा क्यों उठाना? बेटा हुआ तो क्या कहने! किस्मत ही खुल जाएगी तब तो! और यदि लड़की हुई तो सफाया वहीं के वहीं। सुविधा तो है ही तो क्यों न फायदा उठाया जाए?

(यह तब की बात है जब भ्रूण-लिंग-परिक्षण प्रतिबंधित नहीं था। तो हर गली-मोहल्ले में सोनोग्राफी सेंटर भी नहीं थे। शहरों में ही थे, वह तो बैन होने के बाद ही……) और तुरत-फुरत शहर चलने की तैयारियां शुरू हुईं। सबसे पहले तो रेल में आरक्षण कराना था सीटों का। तो पता चला कि अभी तो सब बुक है इस पूरे महीने क्योंकि दिसम्बर में छुट्टियां होती है तो ट्रेनों में भीड़ ज्यादा होती है। जनवरी से पहले तो नही मिल सकती थी सीट।

‘चलो कोई बात नहीं, अगले महीने ही चले जाएंगे’– इन्हों ने भी लापरवाही से सोचा, सुविधा तो है ही….आखिर हम लोकतंत्र में रहते हैं और हमें मताधिकार मिला हुआ है। तो जिसे चाहें वोट दें और जिसे ना चाहें तो ना भी दें, तो क्या फर्क पड़ता है। (सुविधाओं के भी कैसे-कैसे दुरुपयोग होते है! ) और जनवरी के प्रथम सप्ताह में ही आ पाए शहर। यहां आ कर मालूम हुआ कि सरकार ने भ्रूण परिक्षण निरोधक अधिनियम लागू कर दिया है एक जनवरी से तो अब यह अवैध है, अपराध है। सजा भी हो सकती है पकड़े जाने पर। तो कोई भी तैयार नहीं हुआ इस हेतु वे अस्पताल-अस्पताल चक्कर काटते रहे। मामला चूंकि नया था अभी-अभी ही लागू हुआ था अधिनियम सो उससे कन्नी काटने के (बचने के उपाय ) गली-कूंचे अभी इजाद नही हो पाए थे। या अभी उतने विश्वसनीय-कारगर नहीं थे कि हर किसी पर आजमाए जाएं बिना परिक्षण के। लोग भी तो विश्वसनीय ही चाहिए थे न।

अब तो बड़ी आफत-बड़ी मुश्किल में थी जान। ( हां इनकी जान, उस निरपराध नन्ही जान की तो परवाह ही किसे थी। उसकी जान लेने को तुले हुए थे अपनी जान बचाने को। ) करें तो क्या करें और कैसे? ‘अगर लड़की हुई तो ?’’ यही आशंका उनके प्राण निकाले दे रही थी। गोया कि लड़की ना हुई इबोला वायरस हो गया। और उसे लड़की ही कहा जा रहा था लगातार! बेटी तक भी नही!

खैर अब तो हो ही क्या सकता था। गले पड़े ढोल को बजाना ही था। यह मुसीबत भी इसी समय आनी थी? काश ! कुछ पहले ही आ जाते। पिछले माह में ही, तो तुरत-फुरत निपटारा हो जाता हाथों-हाथ। बेकार में ही आरक्षण के चक्कर में पड़े, अपने ही वाहन से आ जाते। और वह भी ना होता तो इतनी तो वीडियो कोच चलती है! लेकिन नहीं विनाश काले विपरीत बुद्धि — ओह ! होनी को कौन टाल सकता है? जब किस्मत ही फूटी हो तो क्या हो सकता है ?..वगैरा-वगैरा आत्मालाप-प्रलाप..पश्चाताप…हर बार, बार–बार एक दीर्घ नि;श्वास के साथ। दिल था कि हौल खाए जा रहा था, बैठा ही जा रहा था उनका। दिल को दिलासा देने को तय हुआ की यदि लड़की हुई तो किसी को गोद दे देंगे। उनका भी भला और अपना भी भला। और घर-परिवार-नाते-रिश्तेदारों, मित्रों-परिचितों पर नजर घूमने लगी कि कहीं कोई नि:संतान दम्पति मिल जाए तो पाप कटे। वे भी खुश और अपन भी सुखी-प्रसन्न। कहीं-कहीं तो बात करके भी रखी कि कही कोई हो, गोद लेने का इच्छुक तो बताना।

यूं ही दु;श्चिंता भरे दिन गुजरते गए। आखिर वह घड़ी भी आ पहुंची। और हुआ भी वही जिसका डर था। लड़की…तीसरी लड्की !!! ईश्वर ने भी क्या कहर बरपाया था! जो किसी भी तीव्रतम भूकम्प से कम विनाशकारी नहीं था। उन्हें तो लगा कि सारी दुनिया ही समाप्त हो गई हो मानो। सृजन की नहीं विध्वंस की अनुभूति हुई उन्हें। जच्चा तो मानो मनोरोगी ही हो गई। उन्हें तो कोई सुध-बुध ही नहीं थी जैसे बच्चे की। दोनो बड़ी बहनें ही जैसे-तैसे करके सम्भालती रही। मगर स्त्री बीज में भी गजब की जीजिविषा होती है! वह पल ही जाती है, जी ही जाती है तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी! और अगर वह अनूकूल परिस्थितियों का इंतजार करे तो करती ही रह जाए। क्यों कि वह तो कभी होती ही नहीं अनुकूल। वह तो चल पड़ती है अपना रास्ता आप बनाते हुए।

कुपोषित बच्ची शुरु में तो बीमार रही। इतनी कि उसका स्कूल में प्रवेश भी एक वर्ष देरी से हुआ। वह भी बड़ी बहनो ने ही करवाया। उनके पीछे-पीछे जो चली जाया करती थी वह भी स्कूल।

खैर ! किसी तरह दिन बीतने लगे..‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌बोझिल, भारी-भारी…थके हुए-से। उस पर घर-परिवार-समाज की दया-सहानुभूति—-च्च् …च्च…च्च…बेचारी…तीन-तीन लड़किया !!! अब कैसे करेंगे ? विवाह का इतना खर्च कहां से जुटाएगें? और फिर वंश कौन चलाएगा? मुखाग्नि कौन देगा? बेटे से ही नाम रोशन होता है। दहलीज पर चिराग धरने वाला कोई नहीं! वगैरह-वगैरह।

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