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जानिये भागवान की आरती कैसे करें

किसी भी पूजा पाठ, यज्ञ, अनुष्ठान के अंत में देवी-देवताओं की आरती की जाती है। लेकिन क्या आप जानते है भागवान  की आरती करने का सही तरीका, आरती कैसे, कितनी बार और क्यों घुमानी चाहिए – नहीं जानते तो यह लेख अंत तक जरुर पढ़े . उपासक के हृदय में भक्ति दीप को तेजोमय बनाने का व देवता से कृपाशीर्वाद ग्रहण करने का सुलभ शुभावसर है `आरती’ । संतों द्वारा रचित आरतियों को गाने से ये उद्देश्य नि:संशय सफल होते हैं । कोई कृति हमारे अंत:करण से तब तब होती है, जब उसका महत्त्व हमारे मन पर अंकित हो ।

आरती क्यों की जाती है

हम में से ज्यादातर ऐसे लोग हैं जो रोजाना पूजा करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि पूजा के बाद आरती क्यों की जाती है। इसके  करने के पीछे भी एक कारण होता है। आइए जानते हैं इसके करने के पीछे का लॉजिक। ऐसा नहीं है कि केवल धार्मिक महत्व है बल्कि आरती का वैज्ञानिक तर्क भी है।

ऐसा माना जाता है कि पूजा के दौरान अगर आरती की जाए तो व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है। शास्त्रों में इसका  का बहुत ही विशेष महत्व है।आरती कैसे करें

महत्व: हम सभी पूजा करते हुए भगवान की आरती करते हैं। ऐसा माना जाता है कि पूजा के दौरान अगर आ-रती की जाए तो व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है।

आरती की थाली में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन होता है। कपास शुद्ध है, इसमें कोई मिलावट नहीं है। इसी तरह घी भी दूध का मूल तत्व है। कपूर और चंदन भी शुद्ध और सात्विक पदार्थ हैं। जब रुई से घी और कपूर की बाती जलाई जाती है, तो वातावरण में एक अद्भुत सुगंध फैल जाती है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि खूशबू या सुगन्ध का हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता है. इससे हमारा दिल और दिमाग शांत रहता है. साथ ही आरती में बजने वाले शंख और घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है,

आरती कैसे करनी चाहिए

घुमाने का सही तरीका: आमतौर पर लोगों को यह नहीं पता होता है कि शुरुआत हमेशा भगवान के चरणों से ही करनी चाहिए। आरती को 4 बार सीधी दिशा में घुमाएं और उसके बाद 2 बार भगवान की नाभि की आरती करें। इसके बाद 7 बार भगवान के मुख की करें।

आरती का अर्थ क्या होता है? मतलब और राशि

आरती नाम का शाब्दिक अर्थ बहुत ही अनूठा है।  नाम का अर्थ “सर्वशक्तिमान की पूजा का कार्य” है।

अर्थपूजा का रूप, भगवान की स्तुति में भजन गाना
लिंगलड़की
धर्महिन्दू
अंकज्योतिष22
राशिमेष

आरती कितने प्रकार से की जाती है

घी की लौ को आत्मा की आत्मा के प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। यदि भक्त अंतरतम हृदय से भगवान को पुकारते हैं, तो इसे पंचरति कहा जाता है। आमतौर पर दिन में एक से पांच बार आरती की जाती है। यह सभी प्रकार के धार्मिक समारोहों और त्योहारों में पूजा के अंत में किया जाता है। एक बर्तन में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या में बत्तियां (जैसे 3, 5 या 7) जलाकर की जाती है। इसके अलावा कपूर से भी आरती की जा सकती है। आम तौर पर पांच रोशनी के साथ आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहा जाता है।

आरती पांच तरह से की जाती है। पहला दीपमाला से, दूसरा पानी से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए कपड़ों से, चौथा आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवां साष्टांग प्रणाम अर्थात शरीर के पांच अंगों (मस्तिष्क, हृदय, दोनों कंधों, हाथ और घुटनों) से . पांच आत्माओं का प्रतीक यह  मानव शरीर की पांच आत्माओं का प्रतीक माना जाता है।

भागवान की आरती करने का सही तरीका

  • ज्योति,थाली या दीपक : आरती करते हुए उसमें शामिल व्यक्तियों के मन में भावना होती है कि पांचों प्राणों यानी व्यक्ति पूरे अस्तित्व और चेतना से इैश्वर की आराधना कर रहा है। घी की ज्योति जीव के आत्मा की थाली या दीपक को इष्टदेव के सामने निश्चित संख्या में गोलाकार घुमाया जाता है। घुमाने की प्रक्रिया से वृत इस तरह रेंखांकित हो कि ओम की आकृति बन जाए।
  • जल से भरे कलश – आरती में जल से भरे कलश, नारियल, तांबे के सिक्के नदियों के जल अर्थात प्रकृति के सभी उपहारों का प्रयोग होता है। इसमें में जिस थाली का प्रयोग किया जाता है,
  • दीपक – वह प्रायः पीतल, तांबा, चांदी या सोने की हो सकती है। इसमें एक दीपक धातु का, गीली मिट्टी का या गुथे हुए आटे का होता है। यह दीपक गोल या पंचमुखी, सप्तमुखी अधिक विषम संख्या मुखी हो सकता है। इसे तेल या शु़द्ध घी के जरिए रूई की बत्ती से जलाया गया होता है।
  • तेल का प्रयोग – प्रायः तेल का प्रयोग रक्षा दीपकों में किया जाता है। इसमें  दीपकों में घी का उपयोग कर सकते हैं। बत्ती के स्थान पर कपूर का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसमें  में जल से भरे कलश, नारियल, मुद्रा, तांबे के सिक्के के अलावा नदियों के जल का उपयोग किया जाता है।
  • तुलसी का प्रयोग – तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक होती है। कलश में उठती लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना भी प्रतीक माना जाता है। इसमें अनिवार्य रूप से तुलसी का प्रयोग भी होता रहा है।

सही समय क्या है

शास्त्रों के अनुसार दिन में पांच बार देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए। सुबह 5 से 6 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त में पूजा और आरती करनी चाहिए। इसके बाद सुबह 9 बजे से 10 बजे तक दूसरी बार पूजा करें. दोपहर में तीसरी बार पूजा करनी चाहिए।

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