ठग-बुद्धि

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ठग-बुद्धि

सपाट सडकों पर लू के बवंडर
और……
पुल के इस पार, उस पार
फलों के ढेर का खरीदार ढूंढते
यह मासूम उखडे उजडे,
चेहरे कितने झुलसे से हैं
और…..
तुम हम उनसे चार छह पैसे कम में
सामान खुश हैं,
तृप्त है अपनी
ठग-बुद्धि पर।
उप-वास की रात
उप-वास की रात
जो कुछ घटा
मुझे पहले ही से था उसका आभास…


उप-वास की रात

ठीक तेरे जैसा पुरूष
द्वार पर अतिथि बन आयेगा
प्रणय-निवेदन करेगा
ठीक वैसे ही…
उप-वास की रात
अखंड लगन और विश्वास में भीगा
लथपथ…
उस का दिव्य चुंबन-
रोम-रोम में मादक विष घोलता
दंश बन जायेगा
ठीक वैसे ही…
मुझे पहले ही मालूम था
मेरी सदेह उडान
विजय पताका
शर-बिद्ध पक्षी-सी
रक्तरंजित करूणा के साथ
मुझे सदा-सदा गायेगी
उपवास की रात
मुझे पहले से मालूम था…।

मुकद्दर की तरह


वैसे ऊपर से नजर आय हैं पत्थर की तरह
हममें तूफान समाये हैं समंदर की तरह
जब भी देखा है उन्हें मैंने यही सोचा है-
घर के कुछ लोग भी होते हैं बवंडर की तरह
मेरे अजीज मेरे दोस्त मुझसे नाखुश हैं
तंगिए दौर में जलते हुए शहर की तरह
एक मासूम जिंदगी का दोष इतना है
गैर को गैर समझना था समझा घर की तरह।
मेरे होथों की कलाई का वे कच्चा धागा
हुआ बदनाम बहुत मेरी मुकद्दर की तरह।

चांदनी


सतपुडा के जंगल पठारोंभर चांदनी,
नर्मदा के तट पर, कछारोंभर चांदनी।
दुनियां के मेले में मुद्रीभर इच्छाएं,
सुख/ दुख के कोई, त्यौंहारोंभर चांदनी।
नदी बीच मछुवारे फेंक रहे जालों को,
पानी का कौन रंग सितारोंभर चादंनी।
विंध्याचल की घटी में आदिवासी हवाएं,
बिखारी चिंरौजी अचारोंभर चांदनी,
खजराहो खजराहो खजुराहो खजुराहो
मौन मिथुन आकृतियां, अभिसारोंभर चांदनी।

बुहरंगी झील


फैल रही सपनों की बहुरंगी झील
लेकिन आकाश में उडती है चील
कोयल की पहली आवाज कौंध छायी
शबनम को झुलसाती धूप रौंद आयी
लपटों ने चंदन-वन को लपेट डाला
पीट रहे ढोल कोल नाच रहे भील
फैल रही सपनों की बहुरंगी झील
फैल रही धंुध बंद होते दरवाजे
साध रहे तीर व्याध राजे महराजे
पिंजडे से उडा सुआ पंछी मनहारा
झुरमुट से उडा बाज साज रहा शील
फैल रही सपनों की बहुरंगी झील
घुंघट में घाटी की बिटिया शरमायीं
मेंहदी-महावर की़ ऋतुएं लहरायीं
दूना सुहाग रात लेती अंगडाई
रैंन में पिया दूर है हजार मील
फैल रही सपनों की बहुरंगी झील

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तुलसीदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित

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